शिवराम झा” गुड्डु” ——–मनुष्यक जीवन वास्तवमे एक पैघ पहेली थिक, जकर समाधान खोजब कहियो सहज नै होइत। जीवनमे जतेक रंग अछी, ततेक संग ओकर उतार-चढ़ाव सेहो। कते क्षण एहन अबैत अछि, जकर प्रभाव एतेक गहिर होइत छैक जे ओ सपना बनिकऽ बारम्बार स्मृतिपटल पर आबि जाइत अछि—ओ दृश्य, ओ पीड़ा, ओ संशय, जे मनुष्यक सोच-समझ केँ झकझोरि दैत अछि।
हमर जन्म एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारमे भेल। हम चारि भाई-बहिनमे जेठ छी। बाल्यकाल पूर्ण रूपेँ ग्रामीण परिवेशमे बितल। प्रारम्भिक शिक्षादान हमर छोटका काकाक निगरानीमे गामक स्कूलमे भेल। ओ समय, जब हम मात्र चारि या पाँच वर्षक रही, शिक्षा हमर जीवनमे प्रवेश केलक।
समय बदलल। बाबूजीक सरकारी नौकरीक कारणेँ सम्पूर्ण परिवार केँ इनरुवा (सुनसरी) लऽ जाए पड़ल। नव जगह, नव भाषा, नव लोक। सब किछु अपरिचित। स्थानान्तरणक कारण हम तेसर कक्षा सँ पढ़ाई शुरू कएलहुँ, मुदा भाषिक कठिनता आ सांस्कृतिक परिवेशक अनभिज्ञताक कारण सालको अंतिम परीक्षा मे असफल भए गेलहुँ। ओ दिन हमर पहिल ‘असफलता’ छल—एक चोट, जे बालमन पर गहिर छाप छोड़ि गेल।
बाबूजीक विश्वास हमरा पर डटल रहल। ओ विद्यालय गेला, शिक्षक सँ बात केलनि, परिस्थिति बुझला आ फेर हम चौथी कक्षा मे चढ़ा देल गेलहुँ। धीरे-धीरे नव परिवेश सँ अनुकूल भऽ गेलहुँ। फेर कोनो दिक्कत नै भेल। मुदा ओ पहिल अनुभव—भिन्न भाषा, भिन्न संस्कृति, आ भिन्न पहिचान—हमरा गहिर सोचमे डुबा देलक।
गाममे एक भाषा, एक संस्कृति छल। सब एक रास। मुदा इनरुवा मे पहुँचलापर बुझायल जे देशक भीतर सेहो कतिपय खण्ड-रेखासभ बनल अछि—भाषा सँ, जाति सँ, संस्कार सँ। एहेन भिन्नता हम कहियो अनुभव नै कएल रही। कखनो-कखनो विद्यालय या गली-गल्लीमे सुनैत रही—”ई पहाड़ी छै”, “ई मधेसी छै”—अथवा दुनू गोटेबीच विवाद आ द्वन्द्व।
हमर स्मृति-पटल पर अमिट रहल एक दृश्य आइयो आँखिक आगाँ झलिकैत अछि—हम अपन घरक खिरकिसँ बाहर देखित रही। भीड़ छल। शोर-शराबा। किछु लोक मिलिकऽ एकटा व्यक्तिके कपार फोड़ैत छल, लाठीसँ पिटैत, इँट-पाथर फेकैत। रक्तस्नात शरीर जमीं पर लोटि रहल छल। हम स्तब्ध। भयगेलहु। किएक? की अपराध केने छल ओ?
बाबूजी हमरा लग एलाह। हमर प्रश्न सँ पहिले ओ स्वयं कहि देलखिन—”नै देखू, ई पहाड़ी-मधेसीक झगड़ा छै।”
हम आश्चर्यचकित। की होइत छै पहाड़ी? की होइत छै मधेसी? हम सभ तँ एकहि देशक नागरिक छी। फेर ई रेखा कोन छै?
समय बीतल। हम बुझऽ लागलौं—जे जकर आँखि छोट से पहाडी आ जकर पैघ से मधेसी ओना बोलचालमे फरक, कोन पोशाक अलग। धीरे-धीरे समाजक विभाजन, मनुक्खक वर्गीकरण, भाषाक आधार पर पहिचान—सभ चीज अपन रूपमे सामने आबऽ लागल। मुदा प्रश्न आइ धरि उहे छैक—”जखन सभ मनुष्य छी, एक देशक वासी छी, त फेर ई भेदभाव, ई हिंसा किएक?”
ई आत्म-संवाद हमर जीवनक अनमोल हिस्सा बनि गेल। पहिचान आ स्वीकृति, भाषा आ संस्कृति, विभाजन आ एकता—सभ पर गहिर सोच करऽ लागलौं। समाज केवल संरचना भरि नै, भावना आ चेतनासँ बनल अछि। जतऽ मनुष्यक गरिमा आ समता सर्वोपरि रहऽ चाही।
हमर बाल्यकाल केवल शिक्षाक प्रारम्भ नै छल, अपितु सामाजिक यथार्थ सँ मुठभेड़क काल रहल। ओ पहिचानक यात्रा जे एखन धरि जारी छै। एहन अनुभव हमरा सामाजिक समरसता, सहिष्णुता आ संवेदनशीलताक महत्त्व बुझा देलक।
जिनगीक पहेली एखन धरि सुलझल नै, मुदा ओ प्रश्न जे बाल्यकालमे उठल छल—ओ आइ तक हमर सोच केँ दिशा दैत रहल अछि। शायद, ई प्रश्न नै होइत तँ हम ‘मनुष्य’ होइते कहाँ?






















